कोर्स › वेल्डिंग (Welding) कोर्स › हिस्सा-undefined: SMAW (छड़-वेल्डिंग) — पहला टाँका से महारत तक
पाठ-104: फ़िल-पास और कैप-पास — भरना और ढँकना
📚 सब पाठ — किसी भी पाठ पर सीधे जाओ
पाठ परिचय
नींव पड़ गई (पाठ-103) — अब दीवार उठानी है और छत डालनी है। मल्टीपास की बाक़ी दो परतों के नाम आप जानते हैं: फ़िल-पास (fill pass — भराई-परतें) जो घाटी को भरती हैं, और कैप-पास (cap pass — ऊपरी-परत) जो सबसे ऊपर ढँकती है। दोनों का मिज़ाज अलग है। भराई में ज़रूरत है धातु की मात्रा और दीवारों से मेल — यहाँ मोटी छड़ और धीरज चलता है। कैप में ज़रूरत है सही नाप और सुंदरता — यहाँ सँभली चाल और आँख चलती है। ग्राहक सिर्फ़ कैप देखता है, पर जोड़ की ताक़त भराई में छिपी है; और कैप ग़लत हो तो किनारे पर वह छोटी खाई बन जाती है जिसे हिस्सा-10 में आप "अंडरकट" नाम से पढ़ेंगे — आज से उससे बचना सीख लीजिए।
सीखने का उद्देश्य
इस पाठ के बाद आप: (1) भराई-परतों में दीवार पकड़ने और परत को घाटी में समतल रखने का तरीक़ा जान लेंगे, (2) कैप के लिए आख़िरी भराई-परत को कितना नीचे छोड़ना है — यह नाप पक्का कर लेंगे, (3) कैप की ऊँचाई (रिइनफ़ोर्समेंट) और चौड़ाई का नियम बता सकेंगे, (4) किनारे की खाई और गुंबद-कैप, दोनों को देखकर पहचान व रोक सकेंगे।
मुख्य बात — भरना ठोस, ढँकना नपा-तुला
(1) भराई-परतें: दीवार पकड़ो, समतल रखो। हर भराई-परत को घाटी की दोनों दीवारों (या पिछली परत और एक दीवार) में गलकर मिलना है। छड़ का झुकाव दीवार की ओर थोड़ा, ताकि तालाब दीवार को चाटे — पाठ-102 का "चमक दोनों तक" नियम। परत पूरी होने पर घाटी के भीतर सतह लगभग समतल रहे — बीच में ऊँची या किनारे पर गड्ढेदार नहीं; जहाँ गड्ढा रह जाए, अगली परत पहले वहीं बैठे। मोटी छड़ (3.15 या 4 मिमी), करंट उसी छड़ के हिसाब से थोड़ा गरम सिरे पर, चाल धीमी-सधी — भराई में धातु भरनी है, दौड़ना नहीं।
(2) आख़िरी भराई — कैप के लिए जगह। भराई तब रुकती है जब घाटी प्लेट की सतह से लगभग 1-1.5 मिलीमीटर नीचे भर जाए — न सतह तक, न ऊपर। यही जगह कैप के लिए है। सतह तक भर दी तो कैप गुंबद बनेगा; बहुत नीचे छोड़ी तो कैप मोटा और किनारे खाली। यह नाप आँख से सीखना है — चॉक की एक लकीर प्लेट की सतह पर खींचकर उससे तुलना कीजिए।
(3) कैप की ऊँचाई — रिइनफ़ोर्समेंट। कैप प्लेट की सतह से थोड़ा ऊपर उठा हो — लगभग 1 से 2 मिलीमीटर (reinforcement — उभार)। इससे कम = जोड़ धँसा, कमज़ोर दिखता और हो सकता है; इससे ज़्यादा = गुंबद — किनारों पर तनाव जमा करता है, मज़बूती नहीं बढ़ाता, सिर्फ़ छड़ खाता और दिखावा करता है। आगे पाठ-125 में यह नाप और पाठ-408 में इसे नापने वाला वेल्ड-गेज मिलेगा।
(4) कैप की चौड़ाई — किनारे का मेल। कैप घाटी के दोनों किनारों से लगभग 1-2 मिलीमीटर बाहर तक फैले और वहाँ प्लेट की सतह में आराम से घुल-मिल जाए — किनारा तेज़ न हो, खाई न हो। किनारे पर खाई तब बनती है जब आर्क किनारे का लोहा पिघला ले गया और उसे वापस नहीं भरा — करंट ज़्यादा, चाल तेज़, या छड़ का झुकाव किनारे से दूर। बचाव: कैप में चाल थोड़ी धीमी, किनारे पर पल-भर ठहराव (बूँद किनारे को भरे), छड़ किनारे की ओर हल्का झुका।
(5) चौड़ी घाटी पर कई कैप-परतें। घाटी चौड़ी हो तो एक कैप काफ़ी नहीं — दो-तीन कैप-परतें पास-पास, आधा-ढँकाव से (पाठ-102), किनारे वाली पहले, बीच वाली आख़िर में। एक और विद्या है — झूलती चाल (वीविंग) से चौड़ी कैप — वह अगले पाठ (105) में, अपने नियमों के साथ।
(6) कैप के बाद। स्लैग हटाइए, फिर आँख से जाँच (पाठ-146 की झलक): ऊँचाई बराबर? किनारे मिले? कहीं खाई, कहीं छींटा? चाहें तो ऊपरी छींटे तार-ब्रश से साफ़ — पर कैप को ग्राइंडर से "सुंदर" बनाने की आदत मत डालिए; घिसने से धातु घटती है, ताक़त नहीं बढ़ती।
चित्र से समझिए
आसान भाषा में समझिए
मिट्टी के घर की दीवार लीपते देखा है? पहले खुरदुरी, मोटी लिपाई — दरारें, गड्ढे सब भरती है; इसमें सुंदरता नहीं, मज़बूती है। यही भराई-परतें हैं — मोटी, ठोस, दीवार तक पहुँचती हुई। फिर ऊपर पतली, चिकनी लिपाई — जो दिखती है, जिस पर हाथ फेरा जाता है; पर वह पतली ही होनी चाहिए, मोटी लीप टूटकर गिरती है। यही कैप है — नपा-तुला उभार, चिकना किनारा। और वह आख़िरी चाल — लीपने वाली हथेली किनारे पर हल्के से ठहरती है ताकि किनारा घुल जाए, खाई न बचे — ठीक वही कैप में छड़ का किनारे पर पल-भर ठहरना है। जो लिपाई में जल्दी करता है, उसका किनारा उखड़ता है; जो कैप में जल्दी करता है, उसका किनारा कटता है।
असली उदाहरण — शेड का वह बीम
एक शेड के लोहे के बीम (पाठ-360 की दुनिया) का जोड़ देखने एक अनुभवी वेल्डर आया। जोड़ ऊपर से बड़ा मोटा, गुंबद जैसा उभरा हुआ था — बनाने वाला गर्व से बोला, "ख़ूब भरा है, मज़बूत है।" अनुभवी ने उँगली किनारे पर फेरी — नाख़ून एक पतली खाई में अटक गया, दोनों ओर। उसने समझाया: गुंबद ने ताक़त नहीं दी, उल्टे किनारों पर खाई बनाई — और ढाँचे पर जब भार झूलता है, दरार ठीक उसी खाई से शुरू होती है। उस्ताद ने ग्राइंडर से गुंबद को घिसा नहीं (घिसने से किनारे की खाई नहीं जाती), बल्कि किनारे की खाई को धीमी चाल की एक पतली परत से भरा और बताया — अगली बार कैप नपा-तुला, किनारे पर ठहराव। लड़के ने उस दिन जाना कि "ज़्यादा" और "मज़बूत" एक शब्द नहीं हैं। (भार-वाहक बीम की मरम्मत उस्ताद व इंजीनियर की सीमा में — पाठ-355।)
AI के साथ अभ्यास
ACS के AI साथी से कहिए: "फ़िल और कैप पर परीक्षा — (क) भराई कहाँ रुके और क्यों, (ख) कैप का उभार और चौड़ाई कितनी, (ग) गुंबद-कैप और किनारे की खाई — हर एक की वजह और बचाव; फिर मुझे तीन झूठे-सच्चे वाक्य दो और मैं बताऊँ कौन-सा ग़लत है।" AI सलाह है, फ़ैसला नहीं — नाप चॉक-लकीर और गेज से, और उस्ताद की आँख से।
आज ही करने का काम (Step-by-Step गतिविधि)
(1) पाठ-103 की सही-जड़ वाली कतरन लीजिए (या नई जड़ बनाइए)। (2) प्लेट की सतह पर घाटी के बग़ल में चॉक से एक लकीर — यह आपकी "सतह" का निशान है। (3) मोटी छड़ से भराई-परतें, दीवार पकड़ते हुए, समतल रखते हुए; हर परत के बाद सफ़ाई और चॉक-लकीर से तुलना — लकीर से 1-1.5 मिमी नीचे पहुँचते ही रुकिए। (4) कैप: सँभली चाल, किनारे पर पल-भर ठहराव, छड़ किनारे की ओर हल्का झुका; एक कैप से चौड़ाई पूरी न हो तो दो कैप आधा-ढँकाव से। (5) ठंडा होने पर उँगली (दस्ताना उतारकर, जब ठंडा हो) किनारे पर फेरिए — खाई अटकती है? उभार कैसा है — किसी सीधे पटरे को कैप पर आड़ा रखकर नीचे की रोशनी देखिए। (6) डायरी: "कैप उभार: कम/सही/गुंबद · किनारा: मिला/खाई · अगली बार: ..."।
आम गलतियाँ
(1) भराई सतह तक या ऊपर तक भर देना — कैप गुंबद बनता है। (2) भराई-परत दीवार से दूर, बीच में ऊँची — किनारों पर खाली कोना। (3) कैप तेज़ चाल से — पतला, धँसा कैप; किनारे पर खाई। (4) कैप पर बहुत धीमा और ज़्यादा करंट — फैला, बहता कैप, दोनों किनारों पर खाई। (5) गुंबद को ग्राइंडर से "सुंदर" बनाना — धातु घटी, किनारे की खाई वैसी ही। (6) चौड़ी घाटी पर एक ही कैप खींचना — बीच ऊँचा, किनारे खाली।
सावधानियाँ
कैप के किनारे पर ठहराव सीखते समय आर्क ज़्यादा देर एक जगह रुक सकता है — छींटे और तेज़ रोशनी; हेलमेट नीचे, आस-पास कोई बिना ढाल वाला नहीं (पाठ-1, 2)। उभार नापने के लिए पटरा गरम जोड़ पर नहीं — पहले ठंडा। ग्राइंडर से कैप घिसने का लालच वैसे भी ग़लत है; कभी करें तो कवच और चश्मा (पाठ-28)। भार-वाहक बीम, कॉलम, ट्रॉली-चेसिस — कैप कितना भी सुंदर हो, ऐसे काम बिना उस्ताद और सीमा-रेखा समझे नहीं (पाठ-355, 364)।
तेज़ दोहराव
भराई = मात्रा + दीवार का मेल, मोटी छड़, समतल रखो · भराई सतह से 1-1.5 मिमी नीचे रुके · कैप उभार 1-2 मिमी, किनारों से 1-2 मिमी बाहर, सतह में घुला · गुंबद = छड़ की बर्बादी + किनारे पर तनाव · किनारे की खाई = करंट ज़्यादा/चाल तेज़/छड़ दूर — बचाव: ठहराव + झुकाव · चौड़ी घाटी = कई कैप, आधा-ढँकाव · ग्राइंडर से कैप सुंदर नहीं बनता।
छोटी परीक्षा (Quiz)
(1) भराई-परतें सतह से कितना नीचे रुकें और क्यों? (2) कैप का सही उभार लगभग कितना? (3) गुंबद-कैप से जोड़ मज़बूत क्यों नहीं होता? (4) किनारे की खाई की तीन वजहें और एक बचाव? (5) भराई-परत में छड़ दीवार की ओर क्यों झुकाते हैं?
पाठ का सार (Chapter Summary)
जड़ के बाद घाटी भरने वाली भराई-परतें जोड़ की ताक़त हैं — मोटी छड़, धीमी सधी चाल, हर परत दीवारों से गलकर मिली हुई और घाटी के भीतर समतल; और भराई प्लेट की सतह से लगभग एक-डेढ़ मिलीमीटर नीचे रुक जाती है, ताकि कैप के लिए जगह रहे। कैप ऊपर ढँकने वाली नपी-तुली परत है — एक-दो मिलीमीटर उभार, घाटी के किनारों से ज़रा बाहर तक फैलकर सतह में घुलती हुई। ज़्यादा उभार गुंबद है, जो छड़ खाता और किनारों पर तनाव जमा करता है; तेज़ चाल या ज़्यादा करंट किनारे पर खाई छोड़ता है, जिसका बचाव किनारे पर पल-भर ठहराव और छड़ का किनारे की ओर झुकाव है। चौड़ी घाटी पर कई कैप आधा-ढँकाव से। और अंतिम सीख — ज़्यादा और मज़बूत एक शब्द नहीं।
आगे क्या सीखें
कैप में एक और विद्या है जिसे आपने ज़िक्र-भर सुना — झूलती चाल, वीविंग (weaving)। चौड़ी घाटी, खड़ी दिशा और कई पाइप-जोड़ों में यह बहुत काम आती है, पर इसकी अपनी सीमाएँ हैं — कब झूलना है, कितना चौड़ा, और कब बिल्कुल नहीं। अगला पाठ (105) इसी पर।
वीडियो (Video)
इस पाठ का जाँचा-परखा वीडियो जल्द यहीं जुड़ेगा। तब तक दो जीवित रास्ते —
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(दोनों नई खिड़की में; वीडियो बिना भी पाठ पूरा — पढ़ाई कहीं नहीं रुकती।)
