कोर्स › वेल्डिंग (Welding) कोर्स › हिस्सा-undefined: SMAW (छड़-वेल्डिंग) — पहला टाँका से महारत तक
पाठ-102: मल्टीपास की विधि — परत-पर-परत
📚 सब पाठ — किसी भी पाठ पर सीधे जाओ
पाठ परिचय
पिछले पाठ में आपने मोटे लोहे का नक़्शा देखा — घाटी, परतें, तीन नाम। आज उस नक़्शे पर चलना है। मल्टीपास (multipass — कई चक्कर) सिर्फ़ "एक के ऊपर दूसरा" नहीं है; हर परत की अपनी जगह, अपनी मोटाई, अपनी दिशा है। ग़लत जगह बैठी परत भीतर खाई छोड़ देती है, और ऊपर से सब ठीक दिखता है — यही इस विधि का धोखा है। इस पाठ में आप एक नियम पक्का करेंगे जो मल्टीपास की रीढ़ है — आधा-ढँकाव का नियम — और उसके साथ परतों की गिनती, छड़ का चुनाव, चाल और ठंडक की रीत। पाठ के अंत में आप मोटी कतरन पर चार-पाँच परतें सही क्रम में चढ़ा सकेंगे और काटकर अपनी जाँच ख़ुद कर सकेंगे।
सीखने का उद्देश्य
इस पाठ के बाद आप: (1) आधा-ढँकाव का नियम बता और लगा सकेंगे, (2) घाटी की चौड़ाई देखकर एक ऊँचाई पर एक या दो परतों का फ़ैसला कर सकेंगे, (3) जड़ के लिए पतली और भराई के लिए मोटी छड़ क्यों — यह तर्क देंगे, (4) परतों के बीच ठंडक और सफ़ाई की दिनचर्या हाथ में उतार लेंगे।
मुख्य बात — आधा-ढँकाव और परतों की बैठक
(1) आधा-ढँकाव का नियम। जब एक ऊँचाई पर दो परतें पास-पास लगती हैं, तो दूसरी परत पहली परत के ऊपर आधी चढ़ी हुई होनी चाहिए — पहली का आधा हिस्सा ढके, आधा नया लोहा पकड़े। पूरी अलग रखी तो बीच में खाई (स्लैग और हवा का घर); पूरी ऊपर चढ़ाई तो घाटी का किनारा खाली रहा। आधा ढँकाव = न खाई, न ख़ालीपन। छत पर खपरैल याद कीजिए — हर खपरैल पिछली पर आधी चढ़ी रहती है, तभी पानी नहीं टपकता। परतें भी खपरैल हैं।
(2) एक ऊँचाई पर कितनी परतें? घाटी नीचे पतली, ऊपर चौड़ी होती है। पेंदे में जगह कम — एक जड़-परत। ऊपर उठते-उठते चौड़ाई बढ़ती है — जहाँ चौड़ाई एक परत की चौड़ाई से ज़्यादा हो जाए, वहाँ उस ऊँचाई पर दो परतें पास-पास (आधा-ढँकाव से)। सबसे ऊपर कभी-कभी तीन। गिनती का ढंग: नीचे से ऊपर, बाएँ से दाएँ — 1 (जड़), 2, 3 (एक ऊँचाई पर दो), 4, 5, 6 (तीन), फिर ऊपरी-परत। चित्र में यही क्रम है।
(3) छड़ का चुनाव। जड़-परत पतली छड़ से (2.5 मिमी) — पतली छड़ घाटी के तंग पेंदे में उतरती है और कम गरमी से जड़ पकड़ती है। भराई मोटी छड़ से (3.15 या 4 मिमी) — ज़्यादा धातु, कम चक्कर। ऊपरी-परत फिर थोड़ी सँभली छड़ से, ताकि सतह चिकनी बने। छड़ बदली तो करंट भी बदलता है (पाठ-86, पाठ-26 की तालिका)।
(4) चाल और कोण। भराई-परतों की चाल थोड़ी धीमी, ताकि धातु ठीक से भरे; छड़ का झुकाव (पाठ-85) वैसा ही — खींचने की दिशा में 10-15 अंश। आधा-ढँकाव वाली परत पर छड़ को थोड़ा पिछली परत की ओर झुकाइए, ताकि गलाव दोनों को पकड़े। तालाब की चमक देखिए — वह पिछली परत और नई दीवार दोनों को छू रही है या नहीं; न छू रही हो तो चाल और धीमी।
(5) परतों के बीच की दिनचर्या। हर परत के बाद तीन काम, उसी क्रम में: हथौड़ा-ब्रश से स्लैग (ख़ासकर किनारों की खाँचों से), आँख से देखना कि परत कहाँ ऊँची-नीची है (अगली परत नीचे वाली जगह पहले पकड़े), और हाथ की दूरी से गरमी — लाल नहीं। बड़े काम में दो टुकड़ों पर बारी-बारी काम कीजिए — एक ठंडा हो, दूसरे पर परत चढ़े; समय बचता है, ठंडक भी मिलती है।
चित्र से समझिए
आसान भाषा में समझिए
छत की खपरैल और खेत की मेड़ — दोनों में एक ही सयानापन है। खपरैल पिछली खपरैल पर आधी चढ़कर बैठती है, तभी बरसात का पानी भीतर नहीं रिसता; अगर दो खपरैल आमने-सामने रख दी जाएँ, बीच की दरार से टपकेगा। मल्टीपास की परतें ठीक वैसी खपरैल हैं — आधा ढँकाव, तो जोड़ भीतर से एक जान; अलग-अलग, तो बीच में दरार, जिसमें स्लैग छिप जाता है। और खेत की मेड़? किसान एक बार में ऊँची मेड़ नहीं बनाता — पहली पट्टी डालकर पैरों से दबाता है, फिर दूसरी। दबाना = स्लैग साफ़ करना और ठंडा होने देना। जो किसान जल्दी में ऊपर-ऊपर मिट्टी चढ़ाता है, उसकी मेड़ पहली बारिश में बह जाती है। परत-पर-परत का धीरज ही मोटे लोहे का बल है।
असली उदाहरण — दो वेल्डर, एक ही चौखट
एक ही गेट का मोटा चौखटा दो वेल्डरों ने आधा-आधा जोड़ा — दोनों ने चार-चार परतें चढ़ाईं, दोनों के जोड़ ऊपर से एक जैसे दिखे। उस्ताद ने दोनों जोड़ों के सिरे ग्राइंडर से काटकर दिखाए। पहले के जोड़ में परतें खपरैल की तरह एक-दूसरे पर चढ़ी थीं — कट पर सिर्फ़ एक चमकदार सतह। दूसरे के जोड़ में दूसरी और तीसरी परत अलग-अलग बैठी थीं — बीच में काली पतली लकीर, स्लैग की; और घाटी के एक किनारे पर छोटी-सी खाली जगह, जहाँ परत दीवार तक पहुँची ही नहीं थी। उस्ताद ने कहा — "ऊपर की सुंदरता ग्राहक देखता है, भीतर की सच्चाई वक़्त देखता है।" दूसरे ने उस दिन आधा-ढँकाव और तालाब की चमक दोनों दीवारों तक पहुँचाना सीखा। अब वह हर मोटे काम से पहले कतरन पर एक नमूना बनाकर काटता है — उसका अपना जाँच-नियम।
AI के साथ अभ्यास
ACS के AI साथी से कहिए: "मल्टीपास पर मेरी परीक्षा लो — (क) आधा-ढँकाव क्या है और न हो तो क्या होता है, (ख) घाटी में एक ऊँचाई पर कितनी परतें, यह कैसे तय हो, (ग) जड़ के लिए पतली छड़ क्यों; फिर एक काल्पनिक 12 मिमी प्लेट पर परतों का क्रम मुझसे बनवाकर सुधारो।" AI सलाह है, फ़ैसला नहीं — अपने काटे हुए नमूने का सच सबसे ऊपर।
आज ही करने का काम (Step-by-Step गतिविधि)
(1) पाठ-101 वाली घाटी-कतरन पर (या नई बनाकर) पहले जड़-परत पतली छड़ से; हथौड़ा-ब्रश। (2) अगली ऊँचाई पर दो परतें — पहली बाईं दीवार से सटी, दूसरी उस पर आधी चढ़ी, दाईं दीवार छूती हुई; हर एक के बाद सफ़ाई, और देखिए कि कहाँ नीची जगह बची। (3) तीसरी ऊँचाई पर तीन परतें — बीच वाली आख़िर में, दोनों किनारों पर आधी चढ़ती हुई। (4) ठंडा कीजिए, फिर ऊपरी-परत पूरी चौड़ाई पर, सँभली चाल से। (5) पूरा ठंडा होने पर सिरे को काटकर देखिए — परतों के बीच कोई काली लकीर? किनारों पर कोई खाली कोना? जो मिले, डायरी में परत-नंबर के साथ लिखिए — "परत-3 बाईं दीवार तक नहीं पहुँची" जैसी साफ़ पंक्ति। (6) वही कतरन दोबारा, ग़लती सुधारकर — दूसरे नमूने की तुलना पहले से कीजिए।
आम गलतियाँ
(1) दो परतें अगल-बगल बिना ढँकाव — बीच में खाई। (2) पूरी परत पिछली पर चढ़ा देना — घाटी का किनारा खाली, भराई अधूरी। (3) जड़-परत मोटी छड़ से — तंग पेंदे में नहीं उतरती, पैठ कच्ची। (4) एक ऊँचाई की आख़िरी परत पहले लगा देना — अगली परत को बैठने की जगह नहीं मिलती। (5) किनारों की खाँचों का स्लैग छोड़ना — अगली परत उसे ढँककर क़ैद कर लेती है। (6) ऊपरी-परत बहुत ऊँची-गुंबद जैसी — किनारों पर खाई, मज़बूती नहीं, सिर्फ़ दिखावा।
सावधानियाँ
मल्टीपास में आप देर तक एक ही जगह झुके रहते हैं — हर दो परतों के बाद कमर सीधी, आँखों को आराम (पाठ-12, 14)। चिपिंग में स्लैग के टुकड़े उछलते हैं — चश्मा हेलमेट उठाने के बाद भी आँख पर रहे (पाठ-1)। गरम परतों पर ब्रश करते हुए दस्ताना अनिवार्य; काटकर जाँच के लिए ग्राइंडर कवच-सहित, टुकड़ा क्लैंप में, हाथ में कभी नहीं (पाठ-28)। भार-वाहक ढाँचे या वाहन के पुर्ज़े पर यह अभ्यास नहीं — कतरन पर; असली काम उस्ताद की देखरेख में (पाठ-364)।
तेज़ दोहराव
आधा-ढँकाव = खपरैल-नियम · घाटी नीचे पतली, ऊपर चौड़ी — ऊपर एक ऊँचाई पर दो-तीन परतें · गिनती नीचे से ऊपर, बाएँ से दाएँ · जड़ पतली छड़, भराई मोटी, ऊपरी सँभली · तालाब की चमक दोनों दीवारों तक · हर परत: स्लैग साफ़ → नीची जगह देखो → ठंडक · नमूना काटकर ख़ुद जाँचो।
छोटी परीक्षा (Quiz)
(1) आधा-ढँकाव न हो तो भीतर क्या बनता है? (2) घाटी में ऊपर जाते हुए एक ऊँचाई पर परतें क्यों बढ़ती हैं? (3) जड़-परत के लिए पतली छड़ और भराई के लिए मोटी — कारण? (4) हर परत के बाद के तीन काम क्रम से लिखिए। (5) काटकर जाँचने पर काली लकीर दिखे तो उसका मतलब?
पाठ का सार (Chapter Summary)
मल्टीपास सिर्फ़ परतों की गिनती नहीं, उनकी बैठक है। रीढ़ का नियम आधा-ढँकाव है — एक ऊँचाई की अगली परत पिछली पर आधी चढ़े, आधा नया लोहा पकड़े; अलग रखी परतें बीच में खाई और स्लैग छोड़ती हैं। घाटी नीचे पतली, ऊपर चौड़ी है, इसलिए पेंदे में एक जड़-परत और ऊपर जाते-जाते एक ऊँचाई पर दो-तीन परतें लगती हैं, गिनती नीचे से ऊपर और बाएँ से दाएँ। जड़ पतली छड़ से, भराई मोटी से, ऊपरी-परत सँभली चाल से। हर परत के बाद स्लैग की पूरी सफ़ाई, नीची जगह की पहचान और थोड़ी ठंडक — और अंत में नमूना काटकर अपनी आँख से जाँच। यही धीरज मोटे लोहे को भीतर तक एक जान बनाता है।
आगे क्या सीखें
परतों में सबसे नाज़ुक और सबसे ज़िम्मेदार है पहली — जड़-परत। जड़ ठीक बैठी तो ऊपर सब सधता है; जड़ कच्ची तो ऊपर की चार परतें भी बेकार। अगला पाठ (103) सिर्फ़ जड़-परत पर — खुली जड़ का अंतराल, कीहोल की चमक, और पीछे से झाँकती पैठ की पहचान।
वीडियो (Video)
इस पाठ का जाँचा-परखा वीडियो जल्द यहीं जुड़ेगा। तब तक दो जीवित रास्ते —
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(दोनों नई खिड़की में; वीडियो बिना भी पाठ पूरा — पढ़ाई कहीं नहीं रुकती।)
