कोर्स › वेल्डिंग (Welding) कोर्स › हिस्सा-undefined: SMAW (छड़-वेल्डिंग) — पहला टाँका से महारत तक
पाठ-101: मोटे लोहे का टाँका — कई परतों का खेल
📚 सब पाठ — किसी भी पाठ पर सीधे जाओ
पाठ परिचय
पाठ-100 में पतले की जीत हुई — चादर पर बिना छेद का टाँका। आज उलटा मोर्चा: मोटा लोहा। बारह मिलीमीटर की प्लेट, दस मिलीमीटर का एंगल, मोटा पाइप — यहाँ एक टाँका लगाइए तो ऊपर से जुड़ा दिखेगा, पर भीतर से दो टुकड़े अलग ही रहेंगे। मोटे लोहे का नियम है: एक बार में नहीं, परत-पर-परत। पहली परत जड़ में बैठती है, फिर उस पर दूसरी, फिर तीसरी — जैसे राजमिस्त्री दीवार एक ईंट की नहीं, कई रद्दों की चुनता है। इस पाठ में आप समझेंगे कि मोटा लोहा परतें क्यों माँगता है, कितनी माँगता है, और परतों का क्रम क्या है। हाथ का अभ्यास अगले पाठ (102) में गहराई से — आज सोच पक्की करनी है, क्योंकि मोटे लोहे पर ग़लती महँगी है: समय भी, छड़ भी, और सबसे बढ़कर भरोसा भी।
सीखने का उद्देश्य
इस पाठ के बाद आप: (1) समझ लेंगे कि मोटे लोहे पर एक टाँका क्यों काफ़ी नहीं — गरमी की पहुँच और पैठ (penetration) की सीमा; (2) प्लेट की मोटाई देखकर परतों की मोटी-मोटी गिनती लगा पाएँगे; (3) तीन नामों — जड़-परत, भराई-परत, ऊपरी-परत — को पहचान लेंगे; (4) जान लेंगे कि परतों के बीच सफ़ाई और ठंडक का नियम क्या है।
मुख्य बात — मोटा लोहा परतें क्यों माँगता है
(1) गरमी की पहुँच की सीमा। पाठ-62 याद कीजिए — गरमी धातु में फैलती है। पतली चादर में आर्क की गरमी आर-पार पहुँच जाती है, इसलिए एक बूँद से ही पूरी मोटाई पिघल जाती है। मोटी प्लेट में आर्क ऊपर की दो-तीन मिलीमीटर पिघलाता है, बाक़ी नीचे का लोहा ठंडा रहता है। ऊपर का टाँका चमकता है, नीचे का लोहा छुआ तक नहीं — यही अधूरी पैठ है, मोटे लोहे का सबसे आम दोष।
(2) इसलिए पहले नाली, फिर परतें। पाठ-64 में आपने V-नाली बनाना सीखा था। मोटे लोहे पर किनारे तिरछे काटकर V-घाटी बनाइए — ताकि आर्क नीचे तक उतर सके। फिर उस घाटी को परतों से भरिए: पहली परत घाटी के पेंदे में (जड़-परत, root pass), बीच की परतें घाटी भरती हैं (भराई-परतें, fill passes), और आख़िरी परत ऊपर ढँकती है (ऊपरी-परत, cap pass)। तीनों के अपने-अपने पाठ आगे हैं (103, 104); आज सिर्फ़ नक़्शा।
(3) कितनी परतें? अँगूठे का हिसाब: एक साधारण छड़ (पाठ-26 वाली 3.15 मिमी) की एक परत लगभग 3 मिलीमीटर मोटाई भरती है। तो 6 मिमी प्लेट = 2 परतें, 10 मिमी = 3-4 परतें, 12 मिमी = 4-5 परतें — घाटी चौड़ी हो तो एक ऊँचाई पर दो परतें पास-पास भी लगती हैं। यह हिसाब शुरू का है; असली गिनती मोटाई, नाली के कोण और छड़ के नाप से बदलती है — इसीलिए पाठ-139 में इसकी तालिका मिलेगी।
(4) परतों के बीच दो नियम। पहला — हर परत के बाद स्लैग पूरा हटाइए (चिपिंग हथौड़ा, तार-ब्रश — पाठ-27)। स्लैग पर अगली परत चढ़ी तो वह भीतर क़ैद हो जाता है — दोष, जिसका नाम हिस्सा-10 में पढ़ेंगे। दूसरा — हर परत के बाद लोहा थोड़ा ठंडा होने दीजिए पर पूरा ठंडा नहीं: लोहा बहुत गरम हो तो अगली परत बहती है और टेढ़ापन बढ़ता है; बहुत ठंडा हो तो परतें आपस में ठीक से नहीं मिलतीं। बीच की यह गरमी आगे (पाठ-327) "इंटरपास तापमान" कहलाएगी — आज इतना याद रखिए: हाथ की दूरी से गरमी महसूस हो, पर प्लेट लाल न हो।
(5) क्रम की आदत। परतें हमेशा एक ही दिशा में न डालिए — एक परत बाएँ से दाएँ, अगली दाएँ से बाएँ। इससे शुरू-अंत की ऊँची-नीची जगहें बराबर होती हैं और गरमी भी बँटती है। यह छोटी आदत आगे चलकर टेढ़ेपन की बड़ी बचत देती है।
चित्र से समझिए
आसान भाषा में समझिए
गाँव में मोटी रोटी सेंकते देखा है? पतली रोटी तवे पर पलटते ही पक जाती है — जैसे पतली चादर एक बूँद से जुड़ जाती है। पर मोटी रोटी की ऊपरी सतह जल जाएगी और भीतर कच्ची रहेगी — जैसे मोटे लोहे पर एक टाँका ऊपर से पका, भीतर से कच्चा। समझदार रसोइया क्या करता है? आँच धीमी, पलटना बार-बार, ऊपर से दबाकर भीतर तक सेंक पहुँचाना। वेल्डर भी वही करता है — किनारे काटकर घाटी बनाता है (भीतर तक रास्ता), और एक मोटी परत की जगह कई पतली परतें चढ़ाता है, हर परत को अपना समय देकर। एक और मिसाल — राजमिस्त्री। दस फुट की दीवार एक दिन में नहीं खड़ी करता; हर रद्दे के बाद मसाला जमने देता है, सीधाई नापता है, फिर अगला रद्दा। परत = रद्दा। जल्दबाज़ी में चढ़ाई दीवार झुक जाती है; जल्दबाज़ी में चढ़ाई परतें भीतर से खोखली रह जाती हैं।
असली उदाहरण — ट्रॉली का टूटा हुक
एक ट्रैक्टर-ट्रॉली का खिंचाई-हुक (towing hook) टूटकर आया — मोटा लोहा, करीब बीस मिलीमीटर। दुकान का नया लड़का बोला, "अभी जोड़ देता हूँ", और टूटे मुँह पर सीधे मोटा टाँका चढ़ा दिया। ऊपर से चमकदार जोड़; दो दिन बाद ट्रॉली भरी हुई थी, हुक फिर टूटा — ठीक उसी जगह। टूटा हिस्सा देखा तो राज खुला: टाँका ऊपर की तीन मिलीमीटर में बैठा था, नीचे की सत्रह मिलीमीटर एक-दूसरे को छुई तक नहीं थीं। उस्ताद ने दोबारा किया — पहले ग्राइंडर से दोनों मुँह तिरछे काटकर गहरी घाटी बनाई, फिर पाँच परतें: जड़-परत पतली छड़ से, बीच की तीन मोटी छड़ से, ऊपरी परत पूरी चौड़ाई ढँकती हुई; हर परत के बाद हथौड़ा-ब्रश, हर परत की दिशा बदली। वह हुक आज भी चल रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था — एक ने मोटे लोहे को पतले की तरह जोड़ा, दूसरे ने परतों का खेल खेला। (भार-वाहक पुर्ज़ों पर यह काम बिना उस्ताद के नहीं — पाठ-364 की सीमा-रेखा।)
AI के साथ अभ्यास
ACS के AI साथी से कहिए: "मैं मोटे लोहे की वेल्डिंग सीख रहा हूँ। मुझसे पूछो — (क) 10 मिलीमीटर प्लेट पर लगभग कितनी परतें और क्यों, (ख) हर परत के बाद दो नियम कौन-से, (ग) जड़-परत, भराई-परत, ऊपरी-परत में फ़र्क़; फिर मेरी ग़लती पकड़ो।" याद रखिए — AI सलाह है, फ़ैसला नहीं; असली गिनती प्लेट, नाली और छड़ के नाप से तय होगी, और उस्ताद की आँख से।
आज ही करने का काम (Step-by-Step गतिविधि)
(1) अपनी कतरनों में सबसे मोटा टुकड़ा (कम-से-कम 8 मिमी) ढूँढिए; दो टुकड़ों के किनारे ग्राइंडर से तिरछे कीजिए (पाठ-64 की विधि) — सुरक्षा-चश्मा और कवच-वाला ग्राइंडर (पाठ-28)। (2) दोनों को आधा-मिलीमीटर के अंतर से टैक कीजिए (पाठ-93)। (3) पहली परत घाटी के पेंदे में — पतली छड़, धीमी चाल; बुझते ही हथौड़ा-ब्रश। (4) अब हाथ की दूरी से गरमी महसूस कीजिए — प्लेट लाल नहीं, पर गरम — तभी दूसरी परत, उलटी दिशा में। (5) तीसरी-चौथी परत इसी तरह; आख़िरी परत घाटी की पूरी चौड़ाई ढँके। (6) ठंडा होने पर जोड़ के सिरे को ग्राइंडर से काटकर देखिए — परतें आपस में मिली हैं या बीच में काली लकीर (स्लैग) दिखती है? जो दिखे, डायरी में लिखिए: परतें कितनी, कहाँ स्लैग, कहाँ खाली। यही आपकी पहली बहु-परत डायरी-प्रविष्टि है।
आम गलतियाँ
(1) बिना घाटी बनाए मोटे लोहे पर सीधा टाँका — ऊपर चमक, भीतर खाली। (2) एक ही मोटी परत से घाटी भरने की कोशिश — बहती हुई परत, टेढ़ापन, भीतर छेद। (3) परत के बाद स्लैग आधा हटाना — अगली परत उसे क़ैद कर लेती है। (4) हर परत एक ही दिशा में — एक सिरा ऊँचा, दूसरा नीचा, प्लेट एक ओर झुकी। (5) लाल-गरम प्लेट पर अगली परत तुरंत — परत बहकर किनारों से लुढ़कती है।
सावधानियाँ
मोटे लोहे की वेल्डिंग में प्लेट देर तक गरम रहती है — परत-दर-परत गरमी जमा होती है; काम के बाद भी "ठंडा दिखता" लोहा जलाता है — दस्ताना, चिमटा, और गरम टुकड़े पर चॉक से "गरम" लिखने की आदत (पाठ-14 की थकान-सीख और पाठ-18 की जाँच यहाँ दोगुनी)। कई परतों का मतलब ज़्यादा देर आर्क, ज़्यादा धुआँ — हवा-निकासी (पाठ-15) और मास्क (पाठ-7) अनिवार्य। मोटी प्लेट काटने-घिसने में ग्राइंडर देर तक चलेगा — कवच, चश्मा, और हर दस मिनट पर हाथ को आराम। भार सहने वाले पुर्ज़े (हुक, एक्सल, चेसिस) का बहु-परत जोड़ अकेले, बिना उस्ताद, कभी नहीं — यह अभ्यास कतरनों पर है।
तेज़ दोहराव
मोटा लोहा = एक टाँका नहीं, परतें · पहले V-घाटी (पाठ-64), फिर भराई · 3 नाम: जड़-परत, भराई-परत, ऊपरी-परत · अँगूठा-हिसाब: साधारण छड़ की एक परत ≈ 3 मिमी · हर परत के बाद स्लैग साफ़ + थोड़ी ठंडक (लाल नहीं, गरम हाँ) · दिशा बारी-बारी बदलो · अधूरी पैठ = मोटे लोहे का सबसे आम दोष।
छोटी परीक्षा (Quiz)
(1) मोटे लोहे पर एक टाँका भीतर से क्यों नहीं जुड़ता? (2) परतों से पहले किनारों का क्या किया जाता है और क्यों? (3) जड़-परत, भराई-परत, ऊपरी-परत — किस क्रम में? (4) हर परत के बाद के दो नियम लिखिए। (5) 12 मिमी प्लेट पर अँगूठे के हिसाब से लगभग कितनी परतें?
पाठ का सार (Chapter Summary)
मोटे लोहे पर आर्क की गरमी ऊपर की दो-तीन मिलीमीटर तक पहुँचती है, इसलिए एक टाँका ऊपर से जुड़ा और भीतर से कच्चा रह जाता है — अधूरी पैठ। इलाज दो कदम का है: पहले किनारे तिरछे काटकर V-घाटी बनाना, ताकि आर्क नीचे तक उतरे; फिर घाटी को परत-पर-परत भरना — पेंदे में जड़-परत, बीच में भराई-परतें, ऊपर ढँकने वाली ऊपरी-परत। साधारण छड़ की एक परत लगभग तीन मिलीमीटर भरती है, इसी से परतों की मोटी गिनती निकलती है। हर परत के बाद स्लैग पूरा हटाना और प्लेट को थोड़ा ठंडा होने देना, और परतों की दिशा बारी-बारी बदलना — यही तीन आदतें मोटे लोहे के जोड़ को भीतर तक मज़बूत बनाती हैं। भार-वाहक पुर्ज़ों पर यह काम उस्ताद की देखरेख में ही।
आगे क्या सीखें
नक़्शा समझ में आ गया — अब हाथ की बारी। अगला पाठ (102) परतों को सचमुच चढ़ाने की विधि सिखाएगा: पहली परत कहाँ से शुरू, अगली परत पिछली के किस हिस्से पर बैठे, चाल कितनी, छड़ कितनी मोटी — यानी मल्टीपास की पूरी विधि। कतरनें और मोटे टुकड़े तैयार रखिए।
वीडियो (Video)
इस पाठ का जाँचा-परखा वीडियो जल्द यहीं जुड़ेगा। तब तक दो जीवित रास्ते —
🎬 YouTube पर इस पाठ के वीडियो खोजें 🏛️ BharatSkills सरकारी वीडियो-मंच
(दोनों नई खिड़की में; वीडियो बिना भी पाठ पूरा — पढ़ाई कहीं नहीं रुकती।)
