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कोर्स › वेल्डिंग (Welding) कोर्स › हिस्सा-undefined: यंत्रों की पहचान

पाठ-33: AC और DC — बिजली के दो मिज़ाज

पढ़ाई का समय: 11-13 मिनट · पाठ 33 / 630 · पढ़ाई पूरी तरह मुफ़्त

📖 कोर्स-परिचय

📚 सब पाठ — किसी भी पाठ पर सीधे जाओ
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पाठ परिचय

याद कीजिए पाठ-22 (नाम-पट्टी), जहाँ हमने वेल्डिंग मशीन के ऊपर चिपकी हुई धातु की उस प्लेट को पढ़ना सीखा था। उस नाम-पट्टी पर कुछ अजीब-से अक्षर लिखे थे — AC और DC। तब हमने वादा किया था कि इन अक्षरों का गहरा राज़ हम आगे खोलेंगे। आज वह वादा निभाने का दिन आ गया है!

जैसे हमारे गाँव या मोहल्ले में दो तरह के लोग होते हैं — एक जो हमेशा शांत रहकर एक ही दिशा में अपना काम करते हैं, और दूसरे जो बहुत चुलबुले होते हैं, पल में इधर तो पल में उधर दौड़ते हैं। बिजली के भी ठीक ऐसे ही दो स्वभाव यानी मिज़ाज होते हैं। एक को हम कहते हैं अल्टरनेटिंग करंट (Alternating Current) यानी AC, और दूसरे को कहते हैं डायरेक्ट करंट (Direct Current) यानी DC।

अगर आप वेल्डिंग के मैदान में एक पक्के कारीगर बनना चाहते हैं, तो इन दोनों स्वभावों को समझे बिना आप कभी सही फ़ैसला नहीं ले पाएँगे। आपने पाठ-21 (ट्रांसफार्मर/इन्वर्टर) में देखा था कि कुछ मशीनें बहुत भारी होती हैं और वेल्डिंग करते समय बहुत सारे छींटे उड़ाती हैं, जबकि कुछ छोटी मशीनें बहुत ही चिकना टाँका लगाती हैं। ऐसा क्यों होता है? इसकी जड़ भी इसी AC और DC के अंतर में छिपी है। आइए, आज इस पूरे खेल को बहुत ही आसान और देसी मिसालों के साथ समझते हैं।

सीखने का उद्देश्य

इस पाठ को पूरा पढ़ने के बाद आप ये बातें बहुत आसानी से समझ जाएँगे:

1. AC और DC बिजली का असली स्वभाव क्या है और इनके बहने का तरीक़ा एक-दूसरे से कितना अलग है।
2. पुराने भारी ट्रांसफार्मर और नए ज़माने के हल्के इन्वर्टर का वेल्डिंग की सफ़ाई पर क्या असर पड़ता है (जो पाठ-21 में हमने अधूरा छोड़ा था)।
3. DC वेल्डिंग में होल्डर (Holder) और अर्थिंग क्लैंप (Earthing Clamp) के तारों को बदलने से आँच यानी गरमी का बँटवारा कैसे बदल जाता है।
4. अपनी छड़ के डिब्बे (Electrode Box) पर लिखी हिदायतों (पाठ-26) को देखकर सही मशीन और सही पोलरिटी (Polarity) का चुनाव करना।

मुख्य बात — बिजली के दो स्वभाव और वेल्डिंग का कनेक्शन

आइए सबसे पहले इन दोनों प्रकार की बिजली के स्वभाव को अलग-अलग करके समझते हैं।

1. AC बिजली (Alternating Current) — झूला झूलती बिजली:
अल्टरनेटिंग करंट यानी AC वह बिजली है जो हमारे घरों के खंभों से आती है। इसका स्वभाव एक बड़े झूले की तरह होता है। जैसे झूला एक बार आगे जाता है और फिर पीछे आता है, वैसे ही यह बिजली भी अपनी बहने की दिशा लगातार बदलती रहती है। भारत में हमारे घरों में आने वाली AC बिजली एक सेकंड में 50 बार अपनी दिशा बदलती है। इसे तकनीकी भाषा में 50 हर्ट्ज़ (Hertz) की आवृत्ति (Frequency) कहा जाता है। यह बिजली बहुत चुलबुली होती है, पल में प्लस (+) तो पल में माइनस (-) हो जाती है।

2. DC बिजली (Direct Current) — बहती नदी जैसी बिजली:
डायरेक्ट करंट यानी DC वह बिजली है जो हमें बैटरी (Battery) से मिलती है। इसका स्वभाव बहुत ही शांत और सीधा होता है। जैसे नदी पहाड़ से निकलकर एक ही दिशा में बहती है, वैसे ही DC बिजली भी हमेशा एक ही दिशा में बहती है — प्लस (+) से माइनस (-) की तरफ़। यह अपनी दिशा कभी नहीं बदलती। मोबाइल की बैटरी, टॉर्च का सेल, या गाड़ी की बैटरी — इन सबमें DC बिजली ही होती है।

वेल्डिंग मशीन में इनका क्या काम है?
अब सोचिए, जब हम वेल्डिंग करते हैं, तो हमें एक स्थिर और शांत आग की लपट यानी आर्क (Arc) चाहिए होती है।

पुराने ज़माने के भारी वेल्डिंग ट्रांसफार्मर (Transformer) सीधे खंभे की AC बिजली को लेकर ही वेल्डिंग करते थे। क्योंकि AC बिजली हर सेकंड 50 बार अपनी दिशा बदलती है, इसलिए वेल्डिंग की लपट भी हर सेकंड बुझती और जलती रहती है। हमें आँखों से तो यह नहीं दिखता, पर वेल्डिंग करते समय इसकी वजह से बहुत सारे छींटे उड़ते हैं और टाँका भी थोड़ा खुरदरा बनता है।

वही दूसरी तरफ़, आज के नए इन्वर्टर (Inverter) वेल्डिंग मशीनें (पाठ-21) भीतर ही भीतर उस छटपटाती AC बिजली को शांत DC बिजली में बदल देती हैं। क्योंकि DC बिजली एक ही दिशा में लगातार बिना रुके बहती है, इसलिए इसकी लपट बहुत ही शांत और स्थिर होती है। नतीजा यह होता है कि टाँका एकदम मक्खन की तरह चिकना लगता है और छींटे बहुत ही कम उड़ते हैं।

पोलरिटी (Polarity) यानी तारों की अदला-बदली का जादू:
क्योंकि DC बिजली में प्लस (+) और माइनस (-) हमेशा तय रहते हैं, इसलिए यहाँ एक बहुत बड़ा खेल होता है जिसे हम पोलरिटी (Polarity) यानी ध्रुवता कहते हैं। मशीन के सामने दो खूँटियाँ बनी होती हैं — एक पर प्लस (+) का निशान होता है और दूसरे पर माइनस (-) का।

अगर हम अपने होल्डर (Holder) के तार को प्लस (+) से जोड़ें और अर्थिंग क्लैंप (Earthing Clamp) के तार को माइनस (-) से जोड़ें, तो इसे डायरेक्ट करंट इलेक्ट्रोड पॉजिटिव (Direct Current Electrode Positive) यानी DCEP या रिवर्स पोलरिटी (Reverse Polarity) कहते हैं।

अगर हम इसका उल्टा करें — होल्डर को माइनस (-) से और लोहे की प्लेट को प्लस (+) से जोड़ें, तो इसे डायरेक्ट करंट इलेक्ट्रोड नेगेटिव (Direct Current Electrode Negative) यानी DCEN या स्ट्रेट पोलरिटी (Straight Polarity) कहते हैं।

आँच का बँटवारा:
DC वेल्डिंग में बिजली के बहने के नियम के कारण, कुल आँच (Heat) का लगभग दो-तिहाई यानी 66% हिस्सा हमेशा प्लस (+) वाली जगह पर पैदा होता है, और सिर्फ़ एक-तिहाई यानी 33% हिस्सा माइनस (-) वाली जगह पर।

इसका मतलब है कि अगर आप होल्डर को प्लस (+) पर जोड़ेंगे, तो आपकी वेल्डिंग छड़ (Electrode) पर 66% आँच रहेगी और वह बहुत तेज़ी से पिघलेगी। 7018 जैसी ख़ास छड़ें (जिनके बारे में पाठ-26 में पढ़ा था) इसी DC+ (DCEP) मिज़ाज को पसंद करती हैं क्योंकि उनके ऊपर चढ़े भारी मसाले को पिघलने के लिए बहुत ज़्यादा आँच की ज़रूरत होती है। अगर आप इन्हें AC मशीन पर चलाएँगे, तो ये ठीक से नहीं पिघलेंगी और थूकती हुई चलेंगी।

चित्र से समझिए

AC बनाम DC — बिजली के दो मिज़ाज 1. AC बिजली (लहर जैसी चाल) दिशा बदलती है (घर की बिजली) 2. DC बिजली (सीधी चाल) एक दिशा में सीधी (बैटरी/इन्वर्टर) DC+ पोलरिटी में आँच (Heat) का बँटवारा छड़ (+) धन 66% आँच (ज़्यादा) लोहा (-) ऋण 33% आँच (कम)
AC बिजली लहर की तरह ऊपर-नीचे होती है, जबकि DC बिजली एक सीध में बहती है। DC+ में छड़ पर ज़्यादा आँच मिलती है।

आसान भाषा में समझिए

इसे समझने के लिए अपनी रसोई और बढ़ई की दुकान की दो बहुत ही सुंदर मिसालें लेते हैं।

पहली मिसाल: बढ़ई की आरी (Saw) और रंदा (Planer)
जब बढ़ई आरी चलाता है, तो वह आरी को आगे भी खींचता है और पीछे भी धकेलता है। आरी दोनों तरफ़ चलती है। इस काम में बहुत सारा बुरादा उड़ता है, बहुत शोर होता है, और लकड़ी का किनारा थोड़ा खुरदरा रहता है। यह है हमारी AC बिजली — जो दोनों दिशाओं में चलती है, शोर करती है और छींटे उड़ाती है।

लेकिन जब बढ़ई लकड़ी को एकदम चिकना करना चाहता है, तो वह रंदे का इस्तेमाल करता है। रंदा हमेशा एक ही दिशा में आगे की तरफ़ दबाकर चलाया जाता है। इससे लकड़ी के पतले-पतले छिलके बहुत ही सफ़ाई से बाहर आते हैं और लकड़ी एकदम शीशे जैसी चिकनी हो जाती है। यह है हमारी DC बिजली — जो एक ही दिशा में चलती है, शांत रहती है और टाँके को एकदम साफ़-सुथरा बनाती है।

दूसरी मिसाल: खेत की सिंचाई
अगर आप पानी की पाइप को हाथ में लेकर लगातार आगे-पीछे हिलाते रहें (जैसे AC अपनी दिशा बदलती है), तो पानी हर तरफ़ बिखरेगा और कीचड़ ज़्यादा होगा। लेकिन अगर आप पाइप को एक ही जगह टिकाकर सीधे क्यारी में डाल दें (जैसे DC एक दिशा में बहती है), तो पानी बिना बिखरे सीधे अपनी जगह पर पहुँचेगा और काम जल्दी होगा।

असली उदाहरण — ख़राब छड़ का सच

हमारे गाँव के बाज़ार में रामू की एक छोटी-सी वेल्डिंग की दुकान है। रामू बरसों से लोहे के दरवाज़े और खिड़कियाँ बनाता आ रहा है। एक दिन उसे ट्रैक्टर की ट्रॉली का एक बहुत भारी हिस्सा जोड़ना था। उसने पाठ-26 (छड़-डिब्बे की लिखावट) को याद किया और बाज़ार से सबसे मज़बूत जोड़ देने वाली 7018 नंबर की छड़ें खरीद लाया।

दुकान पर आकर जैसे ही उसने वेल्डिंग शुरू की, छड़ बार-बार लोहे से चिपकने लगी। जैसे ही वह आर्क बनाने की कोशिश करता, छड़ से पटापट की आवाज़ आती और ढेर सारे जलते हुए छींटे उड़कर उसकी कमीज़ पर गिरने लगते। रामू परेशान हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, "दुकानदार ने मुझे सड़ी हुई, सीलन भरी छड़ें दे दी हैं! यह तो बिल्कुल काम ही नहीं कर रही हैं।"

तभी पास की दुकान से श्यामू उस्ताद वहाँ आए। श्यामू ने रामू की मशीन देखी। वह एक बहुत पुराना, भारी ताँबे के तारों वाला ट्रांसफार्मर था जो सिर्फ़ AC बिजली देता था। श्यामू हँसा और बोला, "रामू भैया, छड़ एकदम बढ़िया है, लेकिन तुम्हारी मशीन का मिज़ाज और इस छड़ का मिज़ाज आपस में मेल नहीं खा रहा है। यह 7018 छड़ तो शेर है, इसे DC+ (डायरेक्ट करंट पॉजिटिव) की भारी आँच चाहिए। तुम इसे इस बूढ़े AC ट्रांसफार्मर पर चलाओगे, तो यह ऐसे ही नख़रे दिखाएगी। यह तो वैसे ही है जैसे ट्रैक्टर में पेट्रोल डाल देना!"

रामू को अपनी ग़लती समझ आई। उसने अपनी छड़ें श्यामू की नई इन्वर्टर मशीन (DC) पर लगाईं। छड़ ऐसे चली जैसे गर्म तवे पर मक्खन पिघल रहा हो! रामू समझ गया कि छड़ और मशीन की जोड़ी सही होना कितना ज़रूरी है।

AI के साथ अभ्यास

अपने AI साथी से ये सवाल पूछकर अपनी समझ को और पक्का करें:

1. "मेरे पास एक इन्वर्टर वेल्डिंग मशीन है। मुझे पतली चादर (Thin Sheet) वेल्ड करनी है। मुझे होल्डर को प्लस (+) में लगाना चाहिए या माइनस (-) में, ताकि चादर में छेद न हो? कारण सहित समझाओ।"
2. "AC वेल्डिंग मशीन में आर्क ब्लो (Arc Blow) यानी लपट का भटकना कम क्यों होता है, जबकि DC में यह ज़्यादा होता है? इसे बहुत सरल हिंदी में बताओ।"
3. "अगर मैं 6013 नंबर की सामान्य छड़ को AC और DC दोनों पर चलाऊँ, तो दोनों के टाँकों में मुझे क्या अंतर दिखाई देगा?"

आज ही करने का काम (Step-by-Step गतिविधि)

आज अपनी दुकान या ट्रेनिंग स्कूल में जाकर ये चार काम ज़रूर करें:

1. अपनी वेल्डिंग मशीन के पास जाएँ और उसकी नाम-पट्टी (पाठ-22) को ध्यान से देखें। वहाँ बने प्रतीकों को पहचानें। अगर लहरदार रेखा ~ बनी है तो वह AC है, और अगर सीधी और टूटी रेखा ⎓ बनी है तो वह DC है।
2. अपनी मशीन के सामने वाले हिस्से को देखें। क्या वहाँ तारों को जोड़ने के लिए प्लस (+) और माइनस (-) के निशान बने हैं? अपने होल्डर के तार को हाथ से छूकर देखें कि वह किस निशान से जुड़ा हुआ है।
3. दुकान में रखे वेल्डिंग छड़ के किसी भी डिब्बे (पाठ-26) को उठाएँ। उसके पीछे लिखी तालिकाओं को ध्यान से पढ़ें। देखें कि वहाँ "Current Type" या "Polarity" के आगे क्या लिखा है। क्या वहाँ AC, DCEP या DCEN लिखा है?
4. अपनी डायरी में एक छोटी-सी तालिका बनाएँ जिसमें आप अपनी मशीन का नाम, उसका बिजली प्रकार (AC/DC) और उसके लिए सबसे सही छड़ का नंबर लिखेंगे।

आम गलतियाँ

चलती मशीन पर तार बदलना: कुछ वेल्डर मशीन को चालू रखकर ही होल्डर और अर्थिंग के तारों को खूँटी से निकालकर आपस में बदलने लगते हैं। यह बहुत बड़ी और ख़तरनाक भूल है। पाठ-6 (झटका-नियम) याद रखें! चलती मशीन पर ऐसा करने से बहुत भारी बिजली का झटका लग सकता है या मशीन के भीतर शॉर्ट-सर्किट हो सकता है। हमेशा मशीन बंद करके ही तार बदलें।

छड़ को ख़राब बताना: बिना मशीन का मिज़ाज (AC या DC) जाँचे, छड़ को ख़राब मान लेना। हमेशा पहले डिब्बे पर लिखी पोलरिटी पढ़ें, फिर मशीन से मिलान करें।

ढीले जोड़ (Loose Connections): DC वेल्डिंग में तार बदलते समय खूँटियों को ढीला छोड़ देना। ढीले जोड़ से वहाँ बहुत गर्मी पैदा होगी और मशीन का टर्मिनल जल जाएगा।

सावधानियाँ

जब भी आप DC मशीन पर काम कर रहे हों, तो यह न सोचें कि DC में झटका नहीं लगता। झटका-नियम (पाठ-6) हमेशा लागू रहेगा। गीले हाथों से या गीली ज़मीन पर खड़े होकर कभी भी होल्डर को न छुएँ।

पोलरिटी बदलते समय हमेशा मशीन का मुख्य स्विच (Main Switch) बंद कर दें और हाथ में सूखे चमड़े के दस्ताने पहने रखें।

अपनी आँखों की सुरक्षा के लिए हमेशा वेल्डिंग हेलमेट का उपयोग करें, क्योंकि DC वेल्डिंग की आर्क बहुत चमकदार होती है और आँखों को नुक़सान पहुँचा सकती है।

तेज़ दोहराव

AC बिजली = दिशा बदलने वाली, घर की लाइन जैसी, ज़्यादा छींटे • DC बिजली = एक दिशा में बहने वाली, बैटरी जैसी, चिकना टाँका • ट्रांसफार्मर मशीन = AC बिजली • इन्वर्टर मशीन = DC बिजली • DC में आँच का बँटवारा = प्लस (+) पर 66% (ज़्यादा) और माइनस (-) पर 33% (कम) • DCEP (रिवर्स पोलरिटी) = होल्डर प्लस (+) पर • DCEN (स्ट्रेट पोलरिटी) = होल्डर माइनस (-) पर • 7018 छड़ = DC+ पोलरिटी की ज़रूरत • बेमेल जोड़ी = थूकती और चिपकती हुई छड़।

छोटी परीक्षा (Quiz)

1. हमारे घरों में आने वाली बिजली का मिज़ाज क्या होता है — AC या DC?
2. इन्वर्टर वेल्डिंग मशीन से लगा टाँका ट्रांसफार्मर मशीन की तुलना में ज़्यादा चिकना क्यों होता है?
3. DC वेल्डिंग में सबसे ज़्यादा आँच (लगभग 66%) किस टर्मिनल (प्लस या माइनस) पर पैदा होती है?
4. अगर होल्डर को प्लस (+) से और अर्थिंग को माइनस (-) से जोड़ा जाए, तो इस पोलरिटी को क्या कहते हैं?
5. 7018 नंबर की छड़ को चलाने के लिए सबसे सही बिजली का मिज़ाज कौन-सा है?

जवाब पाठ में हैं — अपने AI साथी से जँचवाइए।

पाठ का सार (Chapter Summary)

इस पाठ में हमने बिजली के दो स्वभावों — AC (अल्टरनेटिंग करंट) और DC (डायरेक्ट करंट) को बहुत ही सरल तरीक़े से समझा। AC बिजली एक झूले की तरह अपनी दिशा बदलती रहती है जिससे वेल्डिंग में छींटे ज़्यादा उड़ते हैं, जैसा कि पुराने ट्रांसफार्मर में होता है। इसके विपरीत, DC बिजली एक बहती नदी की तरह एक ही दिशा में बहती है जिससे इन्वर्टर मशीनों में बहुत ही चिकना और साफ़ टाँका लगता है। DC वेल्डिंग में पोलरिटी का बहुत बड़ा महत्व है; इसमें प्लस (+) सिरे पर 66% और माइनस (-) सिरे पर 33% आँच होती है। होल्डर को प्लस से जोड़ने पर छड़ तेज़ी से पिघलती है जो 7018 जैसी भारी कोटिंग वाली छड़ों के लिए ज़रूरी है। हमेशा मशीन बंद करके ही पोलरिटी के तार बदलने चाहिए और छड़ के डिब्बे पर लिखी हिदायतों के अनुसार ही मशीन का चुनाव करना चाहिए।

आगे क्या सीखें

बिजली के दोनों मिज़ाज (AC/DC) और उनके सारे नख़रे अब आप अच्छी तरह सीख चुके हैं। बिजली से चलने वाली वेल्डिंग की दुनिया की लगभग सभी बुनियादी बातें अब आपकी मुट्ठी में हैं। लेकिन वेल्डिंग की दुनिया सिर्फ़ बिजली तक ही सीमित नहीं है! एक और बहुत ही पुरानी और मज़बूत वेल्डिंग की तकनीक है, जिसमें बिजली की नहीं बल्कि "आग और गैसों" की ताक़त का इस्तेमाल होता है। हमारा अगला पड़ाव इसी गैस वेल्डिंग की दुनिया में होगा। तो चलिए, अगले पाठ में सीखते हैं — पाठ-34: गैस-वेल्डिंग सेट की पहचान — टॉर्च, रेगुलेटर, पाइप।

वीडियो (Video)

इस पाठ का जाँचा-परखा वीडियो जल्द यहीं जुड़ेगा। तब तक दो जीवित रास्ते —

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(दोनों नई खिड़की में; वीडियो बिना भी पाठ पूरा — पढ़ाई कहीं नहीं रुकती।)