कोर्स › वेल्डिंग (Welding) कोर्स › हिस्सा-undefined: SMAW (छड़-वेल्डिंग) — पहला टाँका से महारत तक
पाठ-103: रूट-पास — पहली परत की जान
📚 सब पाठ — किसी भी पाठ पर सीधे जाओ
पाठ परिचय
घर की नींव ग़लत हो तो ऊपर की मंज़िलें कितनी भी सुंदर हों, घर कमज़ोर है। वेल्ड की नींव है रूट-पास (root pass) — जड़-परत, घाटी के पेंदे में बैठने वाली पहली परत। यही परत दो टुकड़ों को नीचे से जोड़ती है; ऊपर की भराई-परतें तो उसी पर टिकती हैं। पाठ-101-102 में आपने परतों का क्रम और बैठक सीखी; आज सिर्फ़ पहली परत पर पूरा ध्यान — जड़ का अंतराल कितना हो, छड़ कौन-सी, चाल कितनी, और वह एक निशानी जो बताती है कि जड़ सचमुच नीचे तक पहुँची: कीहोल (keyhole — ताले के छेद जैसी छोटी खिड़की)। जो वेल्डर कीहोल पढ़ना सीख जाता है, उसकी जड़ कभी कच्ची नहीं रहती — और यही हुनर आगे पाइप (पाठ-346) और कूपन-परीक्षा (पाठ-147) में सबसे पहले परखा जाता है।
सीखने का उद्देश्य
इस पाठ के बाद आप: (1) रूट-गैप (जड़ का अंतराल) और रूट-फ़ेस (जड़ का छोटा सीधा किनारा) को पहचान व नाप सकेंगे, (2) कीहोल की चमक देखकर पैठ की पुष्टि कर सकेंगे, (3) जड़ के लिए छड़, करंट, चाल का तालमेल बैठा सकेंगे, (4) पीछे की ओर झाँककर जड़ की तीन हालतें — सही, कम, ज़्यादा — अलग कर सकेंगे।
मुख्य बात — जड़ को नीचे तक पहुँचाना
(1) जड़ की तैयारी — दो नाप। V-घाटी (पाठ-64) के पेंदे में दो टुकड़ों के बीच थोड़ा अंतराल छोड़ा जाता है — यही रूट-गैप, लगभग 2-3 मिलीमीटर (छड़ के नाप के बराबर, यह आसान याद है)। और घाटी के तिरछे किनारे के सबसे नीचे एक छोटा सीधा हिस्सा रखा जाता है — रूट-फ़ेस, 1-2 मिलीमीटर — ताकि किनारा तुरंत न जले। अंतराल कम = आर्क नीचे नहीं उतरेगा, पैठ कच्ची; अंतराल ज़्यादा = आर्क आर-पार गिरेगा, छेद। दोनों नापें टैक करने से पहले जाँचिए — टैक के बाद नहीं बदल सकते (पाठ-93)।
(2) कीहोल — जड़ की खिड़की। जड़-परत लगाते समय आर्क पेंदे के दोनों किनारों को पिघलाकर एक छोटी-सी खिड़की बनाता है, जिससे पीछे की रोशनी झलकती है — ताले के छेद जैसी, इसलिए कीहोल। यह खिड़की बनी रहे और छड़ के साथ आगे बढ़ती रहे, तो पिघली धातु पीछे तक उतर रही है — पैठ पूरी। खिड़की बंद = पैठ कच्ची, आर्क ऊपर-ऊपर तैर रहा है; खिड़की बड़ी होकर फैली = छेद आने वाला है। कीहोल का नाप लगभग छड़ के नाप जितना ही रहना चाहिए — न कम, न ज़्यादा। यही पढ़ाई है।
(3) छड़, करंट, चाल। छड़ पतली — 2.5 मिलीमीटर; करंट उस छड़ के बीच वाले सिरे पर (पाठ-86 की सूरत-पढ़ाई: न बहुत गरज, न चिपकन); चाल धीमी पर रुकती नहीं। छड़ को घाटी में सीधा, दोनों किनारों पर बराबर झुकाव। छड़ थोड़ी पेंदे में "दबी" सी चलती है — तालाब और कीहोल एक साथ दिखते रहें। हिस्सा-4 के पाठ-110 में आप 6010 छड़ से मिलेंगे, जो जड़ के लिए बनी है; आज साधारण छड़ से सीख पक्की कीजिए।
(4) जड़ की जाँच — पीछे से झाँको। जड़-परत के बाद टुकड़ा पलटिए। पीछे की ओर एक पतली, बराबर चौड़ाई की उभरी लकीर दिखनी चाहिए — यही रूट-पैठ। तीन हालतें: (क) लकीर साफ़, बराबर, हल्की उभरी — सही; (ख) लकीर गायब या टूटी-टूटी — पैठ कम (अंतराल कम था या चाल तेज़); (ग) लकीर मोटी, लटकती बूँदें, कहीं छेद — पैठ ज़्यादा (अंतराल ज़्यादा या करंट ज़्यादा, चाल धीमी)। यही पढ़ाई आगे पाइप में "हाई-लो" और रूट-दोष पहचानने में काम आएगी (पाठ-345, 353)।
(5) जड़ के बाद क्या। जड़-परत पतली होती है — उस पर मोटी भराई-परत से पहले स्लैग की पूरी सफ़ाई और जड़ के किनारों की खाँच ब्रश से खुली रखिए। अगली परत (हॉट-पास — पाठ-348 में पाइप के संदर्भ में) जड़ को गरम रहते पकड़े तो मेल सबसे अच्छा — इसलिए जड़ के बाद ज़्यादा देर न कीजिए।
चित्र से समझिए
आसान भाषा में समझिए
कपड़े की सिलाई याद कीजिए — दो कपड़ों को जोड़ते समय दर्ज़ी पहली सिलाई किनारे से ज़रा भीतर, बराबर दूरी पर डालता है; सुई हर टाँके में दोनों कपड़ों को आर-पार छेदती है। सुई ऊपर वाले कपड़े में ही रह गई तो नीचे वाला जुड़ा ही नहीं — कपड़ा खिंचते ही खुल जाएगा। रूट-पास वही पहली सिलाई है, और कीहोल वह भरोसा है कि सुई आर-पार गई। दूसरी मिसाल — कुएँ की जगत। पहली ईंट की पंक्ति ही बताती है कुआँ गोल रहेगा या टेढ़ा; राजमिस्त्री उस पर सबसे ज़्यादा समय देता है, ऊपर की पंक्तियाँ तो भागती चली जाती हैं। वेल्डर भी जड़ पर सबसे धीमा, सबसे सजग — ऊपर की भराई फिर अपने-आप सधती है।
असली उदाहरण — पाइप-लाइन का पहला दिन
एक लड़का गाँव की दुकान से सीखकर शहर के एक ठेकेदार के यहाँ पानी की लोहे की पाइप-लाइन जोड़ने गया। पहले दिन ठेकेदार ने उसका काम दबाव-जाँच (पानी भरकर दबाव) पर रखा — तीन जोड़ रिसे। कारण वही निकला जो हर नए वेल्डर का होता है: जड़ ऊपर-ऊपर तैरी, कीहोल कभी बना ही नहीं; भराई-परतें शानदार थीं, पर नीचे से दो पाइप बस "मिले" थे, "जुड़े" नहीं। ठेकेदार के पुराने वेल्डर ने उसे एक दिन सिर्फ़ कतरन पर जड़-परत कराई — हर बार पलटकर पीछे की लकीर देखना, अंतराल को छड़ के नाप से मिलाना, कीहोल को आँख से पकड़ना। तीसरे दिन उसके सब जोड़ दबाव-जाँच में खरे उतरे। उस वेल्डर ने कहा, "जड़ आँख से नहीं, पीछे की लकीर से पास होती है।" — यही पंक्ति इस पाठ की आत्मा है।
AI के साथ अभ्यास
ACS के AI साथी से कहिए: "रूट-पास पर मेरी परीक्षा लो — (क) रूट-गैप और रूट-फ़ेस क्या हैं और लगभग कितने, (ख) कीहोल क्या बताता है, बंद या बड़ा हो तो क्या समझें, (ग) पीछे की लकीर की तीन हालतें और हर एक की वजह; फिर मुझसे एक 10 मिमी प्लेट के लिए छड़-करंट-चाल की योजना बनवाकर उसमें होल निकालो।" AI सलाह है, फ़ैसला नहीं — पीछे की लकीर और उस्ताद की आँख अंतिम।
आज ही करने का काम (Step-by-Step गतिविधि)
(1) दो मोटी कतरनों के किनारे तिरछे कीजिए, पेंदे पर 1-2 मिमी सीधा रूट-फ़ेस छोड़कर (ग्राइंडर — कवच, चश्मा)। (2) बीच में 2.5 मिमी की छड़ का टुकड़ा फँसाकर अंतराल नापिए और दोनों सिरों पर टैक कीजिए; छड़ निकाल लीजिए। (3) पतली छड़, बीच वाला करंट, धीमी सधी चाल — आर्क शुरू करते ही कीहोल की खिड़की ढूँढिए; खिड़की दिखे तो उसी नाप पर चलाते रहिए, बड़ी हो तो चाल तेज़ या आर्क ज़रा ऊपर, बंद हो तो चाल धीमी। (4) ठंडा होने पर पलटिए — पीछे की लकीर किस हालत में? डायरी में तीन कतरनों का नतीजा लिखिए: "सही / कम / ज़्यादा — वजह: ..."। (5) जिस कतरन की जड़ सही निकली, उस पर तुरंत (गरम रहते) एक भराई-परत चढ़ाइए और काटकर देखिए कि जड़ और भराई मिली हैं या नहीं।
आम गलतियाँ
(1) अंतराल छोड़ना भूल जाना — आर्क पेंदे में उतरता ही नहीं, पैठ कच्ची। (2) अंतराल बहुत बड़ा — आर्क आर-पार गिरकर छेद। (3) मोटी छड़ से जड़ — तंग पेंदे में नहीं उतरती। (4) कीहोल न देखना, सिर्फ़ ऊपर का तालाब देखना — ऊपर सुंदर, नीचे कच्चा। (5) कीहोल बड़ा होने पर भी चाल धीमी रखना — छेद। (6) जड़ के बाद ज़्यादा देर रुकना — अगली परत ठंडी जड़ से ठीक नहीं मिलती। (7) पीछे से झाँके बिना आगे बढ़ जाना — जाँच के बिना भरोसा।
सावधानियाँ
खुली जड़ में पिघली धातु की बूँदें पीछे की ओर टपकती हैं — काम के नीचे कपड़ा, रबड़, प्लास्टिक या अपना पैर कभी नहीं; नीचे साफ़ रेत/धातु की ट्रे (पाठ-5, 8)। टुकड़ा पलटकर पीछे देखने से पहले वह गरम है — चिमटा और दस्ताना; आँख पास ले जाकर देखें तो चश्मा। पाइप या टंकी जैसे बंद आकार पर जड़-अभ्यास मत कीजिए — भीतर फँसी हवा और धुआँ ख़तरा हैं (पाठ-16, 366)। अंतराल नापने के लिए छड़ का टुकड़ा फँसाएँ तो उसे टैक से पहले निकाल लें — भूल गए तो वह भीतर क़ैद हो जाएगा।
तेज़ दोहराव
रूट-पास = जोड़ की नींव · रूट-गैप 2-3 मिमी (≈ छड़ का नाप) · रूट-फ़ेस 1-2 मिमी · कीहोल = जड़ की खिड़की — नाप ≈ छड़; बंद = कच्ची, बड़ी = छेद · पतली छड़, बीच का करंट, धीमी सधी चाल · पलटकर पीछे की लकीर: सही / कम / ज़्यादा · जड़ के बाद जल्दी अगली परत · जड़ आँख से नहीं, पीछे की लकीर से पास होती है।
छोटी परीक्षा (Quiz)
(1) रूट-गैप और रूट-फ़ेस में फ़र्क़ बताइए। (2) कीहोल बंद हो जाए तो इसका मतलब और इलाज? (3) पीछे की लकीर टूटी-टूटी दिखे तो दो संभावित वजहें? (4) जड़ के लिए पतली छड़ क्यों? (5) जड़ के बाद अगली परत जल्दी क्यों?
पाठ का सार (Chapter Summary)
रूट-पास जोड़ की नींव है — घाटी के पेंदे की पहली परत, जो दो टुकड़ों को नीचे से जोड़ती है। इसकी तैयारी दो नापों से होती है: रूट-गैप (लगभग छड़ के नाप जितना अंतराल) और रूट-फ़ेस (किनारे का छोटा सीधा हिस्सा)। जड़ लगाते समय आर्क पेंदे में एक छोटी खिड़की — कीहोल — बनाता है; वह छड़ के नाप जितनी बनी रहे तो पैठ पूरी, बंद हो तो कच्ची, बड़ी हो तो छेद। पतली छड़, बीच का करंट और धीमी सधी चाल इसका तालमेल हैं। जाँच पीछे से: पतली बराबर लकीर सही, टूटी लकीर कम पैठ, लटकती बूँदें या छेद ज़्यादा पैठ — और हर हालत की वजह अंतराल, करंट या चाल में मिलती है। जड़ के बाद सफ़ाई और जल्दी अगली परत। जड़ आँख से नहीं, पीछे की लकीर से पास होती है।
आगे क्या सीखें
जड़ बैठ गई — अब घाटी भरनी है और ढँकनी है। अगला पाठ (104) फ़िल-पास और कैप-पास पर: भराई-परतों में मोटी छड़ और चाल का तालमेल, किनारों की दीवार पकड़ना, और ऊपरी-परत की वह सही ऊँचाई जो न गुंबद हो, न गड्ढा — साथ में ढँकाव की चौड़ाई का नियम।
वीडियो (Video)
इस पाठ का जाँचा-परखा वीडियो जल्द यहीं जुड़ेगा। तब तक दो जीवित रास्ते —
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(दोनों नई खिड़की में; वीडियो बिना भी पाठ पूरा — पढ़ाई कहीं नहीं रुकती।)
