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कोर्स › टू-व्हीलर सर्विसिंग, EV एवं उद्यमिता कोर्स › अध्याय-27: ACS विज़न 2036

अध्याय-27 · पाठ-3: सरकार का लक्ष्य — 2030 तक 80% two-wheeler EV

पढ़ाई का समय: 11-13 मिनट · अध्याय-27 · पाठ-3 · पढ़ाई पूरी तरह मुफ़्त

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📖 कोर्स-परिचय

🌱 सरल-सार

सरकार, EV को, बहुत बढ़ावा देना चाहती है।
2030 तक, ज़्यादातर नई दोपहिया, EV हों।
यह, सिर्फ़ एक, बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य है।
असली रफ़्तार, कई बातों पर निर्भर है।

📚 इस अध्याय के सब पाठ

सरकार का लक्ष्य, अध्याय-27 के दूसरे पाठ में सीखी, बाज़ार-बढ़त की सोच के बाद, अब, भारत सरकार की, एक बहुत महत्वाकांक्षी, बहुत नीतिगत दिशा दिखाता है — यह गहराई से समझना बहुत ज़रूरी है, यह अध्याय-19 के छठे पाठ में सीखी BS-VI जैसी ही, एक और, बहुत बड़ी, पर्यावरण-केंद्रित नीति है

भारत सरकार का, एक बहुत बड़ा, बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य है — 2030 तक, नई बिकने वाली, ज़्यादातर दोपहिया गाड़ियों (अनुमानित रूप से, लगभग 80%) का, पूरी तरह-Electric होना — यह अध्याय-10 में सीखी EV-तकनीक को, राष्ट्रीय, बहुत नीतिगत स्तर पर, बहुत तेज़ी से बढ़ावा देने की, एक बहुत बड़ी योजना है। यह लक्ष्य, अध्याय-22 के पहले पाठ में सीखी Green-सोच को, राष्ट्रीय स्तर पर, बहुत बड़े पैमाने पर लागू करने की, एक बहुत गंभीर कोशिश है — इसके पीछे, हवा को साफ़ रखने व, Petrol पर, विदेशी निर्भरता कम करने जैसी, कई बहुत बड़ी, बहुत ज़रूरी वजहें हैं।

यह, सिर्फ़ एक, बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य है

यह याद रखना बहुत ज़रूरी है — यह, एक 'लक्ष्य' है, कोई, पहले से तय, पक्की सच्चाई नहीं — असली, ज़मीनी नतीजा, इस लक्ष्य से, कम या ज़्यादा, दोनों हो सकता है, यह अध्याय-27 के पहले पाठ में सीखी, ईमानदार सावधानी की सोच का, नीतिगत, बहुत ज़रूरी रूप है।सरकार का EV-लक्ष्य2030 तक, 80% EV का लक्ष्यहवा साफ़ रखने की कोशिशसिर्फ़ महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैअसली रफ़्तार, कई बातों पर निर्भर

असली रफ़्तार, कई और बातों पर भी निर्भर है

इस लक्ष्य की, असली गति, कई बातों पर निर्भर करेगी — जैसे, अध्याय-21 के छठे व सातवें पाठ में सीखी, Fast-Charging व, Charging-Station की सुविधा, कितनी तेज़ी से बढ़ती है, व, अध्याय-23 के बाईसवें (दशमलव तीन) पाठ में सीखी, Battery की क़ीमत, कितनी कम होती है, यह अध्याय-19 के पहले पाठ में सीखी, संतुलित, यथार्थवादी सोच का, नीतिगत रूप है।

यह ज्ञान, हर मैकेनिक के लिए, दिशा-सूचक है

चाहे यह लक्ष्य, ठीक-ठीक पूरा हो, या, थोड़ा कम या ज़्यादा, यह स्पष्ट है कि, आने वाले सालों में, EV-मरम्मत की समझ, हर मैकेनिक के लिए, बहुत ज़्यादा ज़रूरी होती जाएगी।

संक्षेप में

सरकार, EV को, बहुत बढ़ावा देना चाहती है — 2030 तक, ज़्यादातर नई दोपहिया, EV होने का लक्ष्य है, यह, सिर्फ़ एक, महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, असली रफ़्तार, कई और बातों पर निर्भर है।

अगला पाठ

अगला पाठ Petrol बनाम EV बनाम CNG बनाम Hydrogen — 2036 तक कौन आगे रहेगा पर होगा, यह समझना कि, यह अलग-अलग तकनीकें, आगे, कैसे साथ चलेंगी।

लक्ष्य और ज़मीन का फ़ासला समझो

सरकारी लक्ष्य दिशा बताता है, रफ़्तार नहीं। लक्ष्य ऊँचा रखना नीति की रीत है। ज़मीन अपनी चाल से चलती है। बीते लक्ष्यों का हाल देखो तो यही सीख मिलती है। कुछ पूरे हुए, कुछ आगे खिसके। इसलिए लक्ष्य सुनकर न उछलो, न डरो। उसे हवा का रुख़ समझो। रुख़ बताता है कि सरकार किधर ज़ोर लगाएगी। सब्सिडी, चार्जिंग-ढाँचा, कारख़ाने — पैसा उधर बहेगा। दुकान के लिए इशारा साफ़ है। उस दिशा का हुनर धीरे-धीरे जोड़ते चलो। रुख़ के साथ चलने वाली नाव कम मेहनत में आगे जाती है।

योजनाएँ आती-जाती हैं — ताज़ा जाँच का नियम

सरकारी योजनाओं का स्वभाव मौसमी है। कोई छूट आज है, कल बदल जाती है। नई योजना नए नाम से आ जाती है। राज्य अपनी अलग छूट भी जोड़ते हैं। इसलिए किसी योजना का नाम रटकर मत बैठो। जाँचने का पक्का ठिकाना रटो। योजना की असली जानकारी सरकारी पन्नों पर मिलती है। ख़रीद से पहले वहीं ताज़ा हाल देखो। ग्राहक पूछे तो अंदाज़े से जवाब मत दो। कहो — चलो, आज की छूट साथ देख लेते हैं। पुरानी सुनी-सुनाई छूट बताना भरोसा तोड़ता है। ताज़ा जाँच की आदत ही सही सलाह की जड़ है।

राज्य-राज्य अलग रंग — अपने राज्य की नीति पढ़ो

देश की नीति एक है, राज्यों के रंग अलग हैं। कोई राज्य ख़रीद पर छूट देता है। कोई पंजीकरण-शुल्क माफ़ करता है। कोई चार्जिंग-ढाँचे पर ज़ोर लगाता है। पड़ोसी राज्य का नियम तुम्हारे राज्य में नहीं चलता। इसलिए अपने राज्य की नीति अलग से पढ़ो। परिवहन-विभाग के पन्ने पर वह छपी मिलती है। बदलती भी रहती है — साल में एक नज़र डालो। सीमा के पास की दुकान दोनों राज्यों की नीति जाने। दो नियमों का जानकार दुगने ग्राहकों का सलाहकार है। नीति-ज्ञान मुफ़्त का है, बस पढ़ने की देर है। पढ़ी नीति दुकान की धार बन जाती है।

दुकान पर लक्ष्य का सीधा असर

बड़े लक्ष्य की छाया छोटी दुकान तक पहुँचती है। कैसे — तीन रास्तों से। पहला रास्ता — गाड़ियों का रंग बदलेगा। सड़क पर बिजली-गाड़ी की गिनती चढ़ेगी। दुकान का काम उसी अनुपात में मुड़ेगा। दूसरा रास्ता — हुनर-प्रशिक्षण की योजनाएँ खुलेंगी। नए ईंधन के कोर्स सरकारी ख़र्च पर चलेंगे। ऐसी योजना दिखे तो पहली क़तार में लगो। तीसरा रास्ता — पुरानी गाड़ियों की विदाई-नीति। बहुत पुरानी गाड़ियाँ हटाने की चालें चलेंगी। उनकी जगह नई ख़रीद का बाज़ार बनेगा। तीनों रास्तों पर नज़र रखने वाली दुकान समय से पहले तैयार मिलती है।

लक्ष्य पर बहस नहीं — तैयारी पर मेहनत

लक्ष्य पूरा होगा या नहीं — यह बहस चाय की है। दुकान की मेज़ पर उसका काम नहीं। मान लो लक्ष्य आधा ही पूरा हुआ। तब भी बिजली-गाड़ियाँ करोड़ों में होंगी। यानी हुनर की माँग पक्की है — बहस के दोनों नतीजों में। यही समझ तुम्हें बहस से आज़ाद करती है। ऊर्जा बहस में नहीं, तैयारी में लगाओ। एक-एक औज़ार, एक-एक पाठ जोड़ते चलो। पड़ोसी दुकानें बहस करती रहेंगी। तुम्हारी दुकान काम करती मिलेगी। बाज़ार बहस करने वाले को नहीं, तैयार को चुनता है। लक्ष्य सरकार का है, तैयारी तुम्हारी है।

बदली नीति की ख़बर सबसे पहले कैसे मिले

नीति बदलने की ख़बर देर से मिले तो मौक़ा निकल जाता है। पहले ख़बर पाने के तीन सस्ते रास्ते हैं। पहला — परिवहन और ऊर्जा विभाग के पन्नों पर नज़र। महीने में एक बार खोलकर देख लो। दूसरा — गाड़ी-जगत की एक भरोसेमंद पत्रिका या पन्ना। नीति की बड़ी हलचल वहाँ पहले दिन छपती है। तीसरा — दुकानदारों की अपनी मंडली। दस दुकानों में एक को ख़बर लगे तो सबको बाँटे। यह रीत मंडली में ख़ुद शुरू करो। पहली ख़बर वाला पहला फ़ायदा उठाता है। ख़बर की यह चौकसी बिना पैसे की पूँजी है।

वीडियो (Video)

इस पाठ का जाँचा-परखा वीडियो जल्द यहीं जुड़ेगा। तब तक एक जीवित रास्ता —

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(नई खिड़की में; वीडियो बिना भी पाठ पूरा — पढ़ाई कहीं नहीं रुकती।)